स्वातंत्र्य समर में हिंदी साहित्यकार

स्वाधीनता संग्राम के दौरान अंग्रेजी की दमनकारी नीतियों की विरोध में अपनी लेखनी से देशवाियों में जोश जगाने और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदारी निभाने वाले साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित आलेख………….

भारतेंदु हरि्चंद्र का युग एक ऐसा परिदृश्य उपस्थित करता है, जहां स्वाधीनता के लिए एक ऐसी तड़प है, जिसे देख कर हर भारतीय विस्मित रह जाता है। यही कारण है कि उनका आधुनिक युग ‘ स्वतंत्रता संग्राम ‘ से आते – प्रोत लक्षित होता है। एक ओर, भारतेंदु युग के कलम के सिपाही आजादी कि लड़ाई में हमारे जाबांज सेनानियो का भरपूर उत्सवरदन करते दिखते हैं, वहीं दूसरी ओर अंग्रेजी राज मे दमनकारी नीतियों और अत्याचार की पराकाष्ठा को भृत्सना करते हुए, उनकी शोषण की प्रवृत्तियों पर कठोर सब्धाघट करते लक्षित होते है। भारतेंदु सुस्पष्ट: कहते है –

‘ भीतर भीतर सब रस चूसे, हसी हसी के तन मन धन मूसे।

जाहिर बातन में अति तेज,

क्यों सीख साजन, न सखी अंग्रेज़। ‘

भारतेंदु ने ‘ अंधेरे नगरी चौपट राजा ‘
नामक वायग्यात्मक कृति के माध्येम से तत्कालीन राजव्यवस्था और शासकीय विमूढ़ता पर मारक प्रहार किया है। उनकी कृति ‘ भारतेंदु – दर्शन ‘ में भारतीय आत्मा सजीव हो उधता है।

आहुति देने को तत्पर

स्वतंत्रता आंदोलन में हमारे हिन्दी साहि्यकार की महती भूमिका रही है। इस दृष्टि से ‘ द्विवेदी युग ‘ के साहित्यकार अपनी लेखनी से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अपने प्राण की आहुति देने के लिए तत्पर थे। नाथूराम शंकर, बद्रीनारायण चौधरी ‘ प्रेमधन ‘ , राधाचरण प्रसाद ‘ हितेसी ‘, रामवृक्ष बेनीपुरी , बनारसी प्रसाद , माधव प्रसाद सुकल, यशपाल , राधाकृष्णन दास , फंडिशावर दास रेणु , राहुल सांकृतयायन , आचार्य प. महावीर प्रसाद द्विवेदी , माखनलाल चतु्वेदी, श्रीधर पाठक, मैथलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्रकुमारी चौहान, शिल्पियों ने पराधीन भारत में जिस प्रकार का शवदेश प्रेम जाग्रत किया, वह हिंदी साहित्य के इतिहास में एक करांतिकर अध्याय के रूप में अंकित होना चाहिए था, जो कि शेष रह गया है।

आजादी के दीवाने

माखनलाल चतुर्वेदी, की पर्टिकात्मक रचना ‘ पुष्पा की अभिलाषा ‘ की संवेदना उच्कोटी की है। वह आजादी के ऐसे दीवाने थे, जिन्हें 12 बार कारागार में दिन बिताने पड़े थे। उनकी करांतीकरिता इतनी प्रचंड रही है कि देश ने उन्हें ‘ एक भारतीय आत्मा ‘ के महागोरव से विभूषित किया था। इसी क्रम में मैथलीशरण गुप्त ने ‘ भारत भारती ‘ के माध्यम से सुस्पष्ट: घोषणा के सवर मे कहा था, ‘ जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभियान है। वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मरतक समान है।’

ओजस्वी कवयित्री

एक करांतीकरिक हिंदी महिला साहित्यकार की पराधीनता के विरुद्ध किए जा रहे संग्राम में जब गणना को जाती है तब सुभद्राकुमारी चौहान प्रथम पंकित में अपनी उर्जरिस्त्वा के साथ दिखती है। उन्हे ‘ जबलपुर का प्रथम महिला सत्याग्रही ‘ कहा गया है माखनलाल चतुर्वेदी उनके प्रेंडसरोत्त थे। वह सत्यगृह आंदोलन में कई बार कारागार भेजी गई थी, परन्तु अंग्रेजी शासक उन्हे सत्याग्रही पथ से डिगा न सके थे
ऐसे भ8 साहित्यकार थे, जिनकी देश को स्वाधीन करने में महत्वपूर्ण भूमिका थी, परतू, वे अज्ञात बनकर रह गए है। साहित्यकार के अवदान का उल्लेख करना प्रशासिक होगा, तभी इतिहास के साथ न्याय होगा।

हिंदी हमारी शान पर एक कविता

सृजन का उत्स है संधान भी है।

तरक्की का यही उन्वान भी है।

जुबां कहते है हिंदी आप जिसको,
फकत भाषा नहीं पहचान भी है।

हमारा आचरण है संस्कृति भी,

ये हिंदी ही हमारी शान भी है।

यही लिखता हूं पढ़ता बोलता हूं,

इसी भाषा का सवभिमान भी है।

तपस्या साधना आराधना ये,

तो भाषा व्याकरण का भान भी है।

यही है आत्मा मा भारती की,
यही भारत की सुमुधुर तान भी है।

कहीं मीरा महादेवी की वाणी,
कहीं तुलसी कही रसखान भी है।

कलम की खुशबुएं इसने भिखेरी,

यही इस दौर का गुधगान भी है।

ये बस्ती है कबीर और जायसी कि,

इसी में बसता हिंदुस्तान भी है।

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